काम पर जाना चाहते हैं, तो तैयार रखिये ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’

News Desk

जर्मनी ने इस दिशा में पुख्ता पहल की है और ब्रिटेन ने आधिकारिक रूप से इस योजना में रुचि दिखाई है। योजना है ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’।

नई दिल्ली | गुरुवार को प्रधानमंत्री ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सलाह मांगी की कैसे लॉकडाउन को खत्म करके धीरे-धीरे सामान्य जनजीवन बहाल किया जाए। द गार्जियन के अनुसार पूरी दुनिया में इस बात की चिंता है कि एक बार कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई जीतने के बाद कैसे सामान्य जनजीवन बहाल किया जाए, ताकि कोरोना वायरस का संक्रमण फिर से न फैले। चीन से संकेत मिल चुके हैं कि सही हो चुके मरीजों में कोरोना संक्रमण के लक्षण फिर से उभर आए। जर्मनी ने इस दिशा में पुख्ता पहल की है और ब्रिटेन ने आधिकारिक रूप से इस योजना में रुचि दिखाई है। योजना है ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’।

आपको सामान्य पासपोर्ट के बारे में शायद सब कुछ पता होगा। आप दूसरों को सलाह भी इस मुद्दे पर देते होंगे। यह आपको विदेश यात्रा का पहला अधिकार और योग्यता देता है। इसके बाद वीजा और इमिग्रेशन जैसी शर्तें होती हैं, जिन्हें पूरा करके ही आप विदेश यात्रा कर सकते हैं। जैसे विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट जरूरी होता है वैसे ही कोरोना वायरस के बाद की दुनिया में इम्युनिटी पासपोर्ट होगा, जो आपको काम करके का अधिकार देगा। जी हां, आपने सही पढ़ा है काम करने का अधिकार हैं।

योजना जरूरी क्यो : लॉकडाउन के कारण औद्योगिक उत्पादन ठप हो गया है। सामान्य दुकानों से लेकर स्कूल तक बंद हैं। द गार्जियन के अनुसार दुनिया को हर दिन अरबों डॉलर की आर्थिक चपत लग रही है। ऐसे में वर्क फोर्स को दोबारा काम पर लगाने की चुनौती है। जर्मनी ने इस दिशा में पहल की है। उसने इम्युनिटी पासपोर्ट योजना पर लॉकडाउन का फैसला करने के साथ ही काम करना शुरू कर दिया था। जिन लोगों के पास इम्युनिटी पासपोर्ट होगा उन्हें सबसे पहले काम पर आने का मौका मिलेगा। कोरोना वायरस का हमला अगर दोबारा नहीं होता है तो फिर धीरे-धीरे अन्य लोगों को।

ये कर रहे हैं शोध : जर्मनी के रॉबर्ट रोच इंस्टीट्यूट, जर्मन इंस्टीट्यूट ऑफ वायरस इंफेक्शन और बर्लिन के चैरिएट अस्पताल के इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को जर्मनी के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट पर लगाया है। ब्लड डोनेशन में लगे एनजीओ से मदद ली जा रही है ताकि ज्यादा से ज्यादा सैंपल एकत्रित किए जा सकें। इस दौरान मानव शरीर में मौजूद लाखों तरीके की एंटी बॉडीज को पहचानने और उन्हें कोरोना से लड़ाई पर लगाने की युक्ति सोची जा रही है। स्वस्थ एंटी बॉडीज को पहचाना जाएगा, खासकर वे जो कोरोना के खिलाफ ताकतवर हैं।

ब्रिटेन भी तैयारी में : ब्रिटेन के शैडो हेल्थ सेक्रेट्री जोनाथन एशवर्थ ने बताया कि जर्मनी ने पहल की है। हमारी नजर उनके टेस्ट पर है। हम अपने यहां अपनी जरूरतों के मुताबिक टेस्ट कराएंगे और इम्युनिटी पासपोर्ट योजना पर अमल करेंगे। यह अच्छी योजना शुरुआती रूप से लग रही है। हेलमोट्ज इंस्टीट्यूट फॉर इंफेक्शन रिसर्च के एपिडोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. गेराड क्रूज ने बताया कि ये लोग (इम्युनिटी पासपोर्ट होल्डर) एक तरह के वैक्सिनेशन कार्यक्रम का हिस्सा होंगे, जिन्हें काम करने की रियायत दी जाएगी। हालांकि जर्मनी की सरकार ने आधिकारिक रूप से इस संबंध में अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है।

कैसे तैयार किया जा रहा है इम्युनिटी पासपोर्ट : जर्मनी ने मानव शरीर में मौजूद एंटी बॉडी को लेकर शुरुआती शोध पूरी कर लिया है। अप्रैल के मध्य तक एक लाख लोगों पर इसका प्रयोग किया जाएगा। कोरोना वायरस के प्रति इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को नापा और मापा जा रहा है। इसके बाद इस टेस्ट को बड़ी आबादी पर किया जाएगा। जिन लोगों की एंटी बॉडीज कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ने में कामयाब रहेंगी उन्हें एक सर्टिफिकेट दिया जाएगा, जो इम्युनिटी पासपोर्ट कहलाएगा। लॉकडाउन के बाद ये लोग ही सबसे पहले अपने काम पर लौटेंगे।

पांच साल लागू रह सकती है योजना : ब्रिटेन के सांसद और सर्जन डॉ. फिलिप विदफोर्ड ने बताया कि इससे मुश्किल काम में लगे लोगों को आसानी से वापसी का मौका मिलेगा। खासकर हेल्थ सिस्टम और हेल्थ सिस्टम के सहयोग में लगे लोगों को। उन्होंने बताया कि हम अब भी कोरोना वायरस के बारे में बहुत कुछ नहीं जानते हैं, ऐसे में सतर्क रहना ही होगा। ब्रिटिश सरकार के स्वास्थ्य सलाहकार प्रो. ओपनशॉ का कहना है कि इम्युनिटी पासपोर्ट योजना पांच साल तक अमल में लाई जा सकती है। यह हमें नए वायरसों के प्रभाव के बारे में भी जानने का मौका देगी।

युवाओं को लेकर चिंता : हालांकि ब्रिटेन में योजना को लेकर चिंता भी है। खासकर कमजोर स्वास्थ्य वाले युवाओं को लेकर, जिन्होंने भारी कर्ज लेकर पढ़ाई की है। काम नहीं कर पाने के कारण उनका कर्ज बढ़ता ही जा रहा है। निश्चित रूप से इम्युनिटी पासपोर्ट के कारण उनका काम पर लौटना कठिन होगा। मगर स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि ऐसे लोगों के बारे में बाद में सोचा जा सकता है।

(साभार :दैनिक भास्कर)

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